रीती ने देखा अजय की आँखें उसकी तरफ नहीं थी
बल्कि आसमान में स्थिर हो गईं थीं। चेहरे पर विचित्र
उदासी उतर आई थी। "क्या सोच रहे हो तुम?" उसने पूछा। "कुछ नहीं" जवाब
मिला। "कुछ तो" उसने दोबारा कोशिश की।
अब अजय भी अपने अन्तर्मन में नहीं रख पाया
और बोला- मैं पुनर्जन्म का सोच रहा था।
रीती ने कहा "पुनर्जन्म?"
"हाँ, पुनर्जन्म चाहता हूँ मैं।
"क्या चाहते हो उसमे?"
"तुमको"
"ठीक है, कोई नयी
बात करो अजय"
"तुम समझ नहीं रही हो मैं क्या चाहता
हूँ। हमेशा की तरह। "
"बताओ फिर क्या चाहते हो उस जन्म में?"
"मैं चाहता हूँ कि अगली बार मैं जब इस
दुनिया में आऊँ तो किसी छोटे से खूबसूरत शहर में। "
"आगे बोलो"
"ज्यादा महत्वाकांक्षा न हों। थोड़ा सा
पढ़ लूँ। छोटी सी नौकरी उसी शहर में मिल जाए।"
"और? "
"और तुम मिल जाओ"
"उफ, तुम्हारी हर बात मैं मिल जाऊँ
पर ही आ जाती है।"
"और तुमको मिलना नहीं मुझसे कभी, न इस जन्म
में न किसी जन्म में।"
रीती ने कोई उत्तर नहीं दिया बस अपना हाथ झील
पे पानी में डाल कर थोड़ा सा पानी अजय की ओर उछाल दिया।
"बस हो गया तुम्हारा पुनर्जन्म? या कुछ
बचा है?"
"रहने दो, तुम्हारा
सुनने का मन नहीं।"
"नहीं ऐसा नहीं, लो अब
मैं एकदम गंभीर।" उसने मुंह पर बनावटी गंभीरता लाने की बड़ी ज़बरदस्त कोशिश की।
अजय फिर अपनी काल्पनिक दुनिया में चला गया।
"मैं चाहता हूँ इस बार मैं तुमसे सबसे
पहले मिलूँ, किसी के भी पहले। कोई उलझन न हो, कोई भ्रम
नहीं। मिलें प्रेम हो, माँ पिता हमारे मिलने से ख़ुश हों। शादी
हो धूम धाम से। एक प्यारा सा बेटा तुम्हारी शक्ल का और एक बिटिया मेरी जैसी।"
"नहीं। मुझे नाक बहाती छोटी बच्चियाँ
नहीं पसंद और तुम्हारी शक्ल की लड़की से शादी कौन करेगा?"
"अच्छा जो तुम चाहो।"
"मैं क्यूँ चाहूँ? पुनर्जन्म
तुम्हारा है। हो सकता है मैं किसी और को चाहूँ तब, मेरा कोई हो "
"हाँ, सब तुम्हारे बस एक मुझको छोड़ कर।"
"ओह तुम्हारा पुनर्जन्म पूरा हो गया? आगे और
कुछ नहीं चाहिए?"
"चाहिए बहुत कुछ लेकिन बिना भाग दौड़, बिना उलझनों, बिना परेशानियों की सीधी सादी इस झील सी शांत ठहरी हुई ज़िंदगी- मेरी तुम्हारी।"
तभी पिकनिक मानते स्कूली बच्चों से खचाखच भरी
एक नाव थोड़ी दूर से गुज़र गयी और उनके शोर में रीती की बात अजय को सुनाई नहीं दी-
"तुम वाक़ई ज़िंदगी चाहते हो अजय?"
सत्य यही है जीवन के शोर में काम की बात यूं ही सुनाई नहीं देती। प्रेम सम्मुख होता है दिखाई नहीं देता। हम विश्वास दिलाने और
विश्वास करने में इतना विलंब कर बैठते हैं जो कई जन्मों का सानिध्य मिलकर भी भर नहीं
सकता।
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