Sunday, July 19, 2015

फ़ैसला

आयोजित संवाद था. परिवार के सदस्यों ने उन्हें कुछ देर को एकांत दे दिया. आख़िर ज़िंदगी भर का विषय था. लड़के की आँखें कभी लड़की के झुके हुए चेहरे की ओर जाती थीं और हाथ ज़िंदगी में स्थापित होने की जद्दोजहद मे कम हो रही अपनी केशपंक्ति पर. 

लड़की ने चेहरा उठाया और बड़े प्रयास से कहा मैं अभी ज़िंदगी को समय देना चाहती हूँ. आप समझ रहें हैं ना? लड़के का स्वर सुनाई दिया "हाँ, समझ रहा हूँ". लेकिन लड़की ने देखा लड़के की आँखें उसे नहीं देख रहीं. 


लड़का उस बालों की लट मे उलझ गया था जो लड़की के गालों से गुज़रती हुई गर्दन पर काले तिल से खेल रही थी. फ़ैसला हो चुका था.

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